ग्रीष्म ऋतु में ज्येष्ठ (शुक्र) और आषाढ़ (शुचि) मास आते है। ज्येष्ठ और आषाढ़ मासों के प्रचलित नाम है। शुक्र और शुचि मासों के वैदिक नाम है जिनका सम्बन्ध ऋतु से है ।
शुक्र और शुचि दोनों ही शब्द “शुच्” शब्द से बने हुए है। “शुच्” शब्द का अर्थ होता है सुखना या जलना।
यही ग्रीष्म ऋतु में होता है। यह बसन्त ऋतु के पश्चात आती है। ग्रीष्म ऋतु के पश्चात् वर्षा ऋतु आती है।
बसन्त में जिस प्राकृतिक मधु रस की प्राप्ति होती है वह रस ग्रीष्म (गर्मी) में जल जाता है अथवा सूख जाता है। गर्मी के मौसम में अग्नि तत्व की उग्रता रहती है जिसके परिणामस्वरूप ही एसा होता है। अर्थात यही वह मौसम है जो पृथ्वी के रस (जल) को जला या सुखा देती है ।
वह जो पदार्थो को सुखा य जला देती है, ग्रीष्म ऋतु कहलाती है।
शुक्र मास : वह मास जिसमें सूर्य की उष्णता (गर्मी) बढ़ती है, उसे शुक्र मास कहते है। इसे ज्येष्ठ (जेठ) मास भी कहते है ।
शुचि मास : शुचि वह मास है जिसमें सूर्य की उष्णता (गर्मी/ताप) से उत्पन्न परिणाम दिखने लगता है । अर्थात सूर्य की गर्मी से ही वृक्षों पर आम आदि फल पकने लगते है और खेतों की फसल भी पक जाती है। तथा उष्णता अत्यधिक मात्रा में बढ़ कर वर्षा के आरम्भ की सूचना देने लगती है। यह आषाढ़ मास भी कहलाता है।
शुक्र और शुचि के ज्येष्ठ और आषाढ़ नाम चन्द्रमा की स्थिति के अनुसार है।
जिस मास की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ” ज्येष्ठा ” नक्षत्र पर होता है वह ज्येष्ठ मास कहलाता है। तथा जिस मास की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ” उत्तराषाढ़ (उत्तरा आषाढ़) ” नक्षत्र पर होता है वह आषाढ़ मास कहलाता है।