शिशिर ऋतु का नामकरण किस आधार पर किया गया है ?

शिशिर ऋतु में माघ (तपस्) और फाल्गुन (तपस्य) मास आते है।

यह हेमन्त ऋतु के पश्चात आती है। शिशिर ऋतु के पश्चात् बसन्त ऋतु आती है। माघ और फाल्गुन मासों के प्रचलित नाम है। तपस् और तपस्य मासों के वैदिक नाम है जिनका सम्बन्ध ऋतु से है । तपस् और तपस्य मासों के नाम व अर्थ शिशिर ऋतु के अर्थ से समानता रखते है।

तपाः और तपस्य दोनों ही शब्द ” तपस् ” शब्द से बने हुए है। “तपस्” शब्द “तप् संतापे” धातु से बना है। यही शिशिर ऋतु में होता है। जिस ऋतु में बढ़ी हुई गर्मी वृक्षों के पत्तों को पकाकर गिराती है या शीत (ठण्ड) का शमन (शान्त करना या दबाना) करती है, वह ऋतु शिशिर ऋतु कहलाती है।

तपस् (माघ)

तपस् उस मास को कहते है जिसमें ताप की क्रमशः वृद्धि होती है, जिससे शीतकाल की फसल का पकना आरम्भ होता है। तपस् मास को माघ मास भी कहते है। इसका माघ नाम चन्द्रमा की स्थिति के अनुसार है। जिस मास की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ” मघा” नक्षत्र पर होता है वह माघ मास कहलाता है।

तपस्य (फाल्गुन)

तपस्य उस मास को कहते है जिसमें अन्न परिपाक का स्पष्ट परिणाम दिखाई देता है जैसे जौ, गेहूँ, चने आदि का पकना। तपस्य मास को फाल्गुन मास भी कहते है। इसका फाल्गुन नाम चन्द्रमा की स्थिति के अनुसार है। जिस मास की पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा ” उत्तरा फाल्गुनी” नक्षत्र पर होता है वह फाल्गुन मास कहलाता है।

हेमन्त और शिशिर ऋतुओं को सर्दी का मौसम माना जाता है। मार्गशीर्ष से फाल्गुन (नवम्बर से फरवरी) तक का यह मौसम स्वस्थ्य निर्माण के लिए सर्वाधिक उपयोगी होता है। इस मौसम में पाचक अग्नि बढ़ जाती है, इसलिए भोजन में अधिकतर पौष्टिक पदार्थ लिए जा सकते है। रातें बड़ी हो जाने से रात्रि के भोजन का पचने का भी काफी समय मिल जाता है।

खान-पान में ठंडी चीज़ों की अपेक्षा शरीर को गर्मी पहुँचाने वाली वस्तुओं का सेवन ही शीत ऋतु में योग्य है।

शीत ऋतु में सुबह नाश्ते में हलुवा, लड्डू, ताजी जलेबी या पौष्टिक पाक खाकर दूध पीना चाहिए।
अतिरिक्त पौष्टिक पदार्थ खाने से अग्नि मन्द ना हो जाये इसलिए विशेषकर प्रातः टहलना, सूर्यनमस्कार और यथाशक्ति व्यायाम अवश्य करना चाहिए।

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