पद्मिनी एकादशी (पुरुषोत्तम मास, शुक्ल पक्ष) व्रत कथा

पद्मिनी एकादशी का व्रत तीन साल में एक बार आता है। यह एकादशी पुरुषोत्तम मास के शुक्ल पक्ष में आती है। इसे कमला एकादशी भी कहा जाता है। वर्ष 2020 में पुरुषोत्तम मास होने के कारण यह एकादशी 27 सितम्बर, रविवार को है।

॥ अथ अधिकमास शुक्लैकादशी कथा ॥

युधिष्ठिर बोलते है – हे जनार्दन ! मलमास के शुक्ल पक्ष में कौनसी एकादशी होती है?
उसका क्या नाम है? क्‍या विधि है? सो कहिये।

श्रीकृष्ण बोलते है – मलमास की बड़ी पवित्र एकादशी होती है; उसका नाम पद्मिनी है। प्रयत्न से उसका उपवास करने से वह मनुष्य को विष्णु लोक पहुँचा देती है। मल मास में एकादशी बड़ी पवित्र और पापों की नाश करनेवाली है। उसका फल ब्रह्माजी भी नहीं कह सकते।

पहले ब्रह्माजी ने नारदजी के लिये पापों के राशियों का नाशक और भुक्ति मुक्ति के देनेवाले इस पद्मिनीके उत्तम

व्रत को कहा था। भगवानका बचन सुनकर धर्मज्ञ राजा युधिष्टिर बड़े प्रसन्न होकर भगवान से पद्मिनी एकादशी की विधि पूछने लगे। राजा के वचन सुनकर श्रीकृष्णजी बोलते है – हे राजा ! सुनो, में तुमसे वह व्रत कहता हूं कि जो मुनीश्वर भी जानते नहीं है।

दशमी के दिन से व्रत का आरंभ किया जाता है ।

कांसे के पात्र में भोजन, मांस, मसूर, अन्न, चने तथा कोदों शाक, शहद और पराया अन्न ये आठ वस्तु दशमीके दिन त्याग दे। और हविष्यान्न कहिये जौ, चावल ओर सेंधा नमक खाय । दश्मी के दिन भूमि पर सोवे और ब्रह्मचर्य से रहे ।

जब एकादशी का दिन आवे तो बड़े आद रसे प्रातःकाल उठकर मल त्याग करे और दंत धावन न करे और बारह कुल्ले करके शुद्ध और सावधान हो जाय। फिर बुद्धिमान पुरुष सूर्योदय होने पर शुभ तीर्थ में स्नानके लिये जाय।

गोबर, मिट्टी, तिल पवित्र कुशा और आंवले का चूर्ण ये शरीर से लगाकर विधिपूर्वक स्नान करे ( और यह कहता जाय ) 100 बाहुवाले वाराह रूप कृष्ण ने तुझे उठाया है। और परशुराम करके ब्राह्मणोंको दी गई और कश्यप से अभिमंत्रित की गई ऐसी हे मृत्तिके ! तुझे नमस्कार है; तू मुझे विष्णुपूजनके अधिकारी बना दे।

सब औषधियोंसे उत्पन्न गौ के पेटमें स्थित भूमि को पवित्र करने वाला गोबर मुझे पवित्र करे।

ब्रह्मा के थूकसे उत्पन्न, भुवन को पवित्र करनेवाली धात्री मैंने तेरा स्पर्श किया है, तू मेरे अंग को निर्मल और पवित्र कर।

मैं तुझे नमस्कार करता हूँ।

“हे देवों के देव ! हे जगन्नाथ ! हे शंखचक्रगदाधर ! हे विष्णु भगवन्‌ ! अपने तीर्थ में स्नान करने की आज्ञा दीजिये।”

इस मंत्रको पढकर वरुण के मंत्रों का जप करे, गंगा आदि तीर्थो का स्मरण करके जहाँ पर जलाशय हो वहाँ विधिपूर्वक स्नान करे।

फिर हे नृपश्रेष्ठ ! शरीर को विधि से मार्जन करे। फिर श्वेत धुला हुआ ओर सावत वस्त्र पहिन ले। और विधिपूर्वक संध्या और देव पितरों के तर्पण करके भगवान के मंदिर में जाकर विष्णु का भजन करे।

एक मास सोने के बने हुये राधिकासहित कृष्णदेव का और शिव पार्वती का विधिपूर्वक पूजन करे। धान्य के ऊपर तांबे का या मिट्टी का कुंभ स्थापित करे। उसे सुन्दर वस्त्र ओढाकर खूशबूदार गंध का लेप करे। उसके ऊपर सोने का, चांदी का, तांबे का पात्र और उस पर भगवान की स्थापना कर विधिपूर्वक उनका पूजन करे।

निर्मल जल से स्नान कराकर गंध, धूप, चन्दन, अगर रखे और कपूर आदि सुगंधियों से भगवान का पूजन करे।

और विविध तरह के फूल – कस्तूरी, श्वेतकमल और उस मोसम के फूलों से परमेश्वर का पूजन करे। धूप लुगावे, दीप लगावे। और यथा शक्ति नाना प्रकार के नैवेद्य चढावे और कपूर की आरती उतारे।

इस प्रकार से भग्वान और शिवजी का पूजन करे। फिर उनके आगे भक्तिपूर्वक नृत्य करे, गीत गावे और उस दिन पतित और पापियों के साथ न तो बात करे और उनको स्पर्श न करे। और उस दिन मिथ्या न बोले, सत्य से पवित्र वचन बोले। रजस्वला को न छुए और ब्राह्मण तथा गुरु की निंदा न करे। और विष्णु के आगे वैष्णवों सहित पुराण सुने और मलमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत बिना खाये पीये करे।

और जो न रहा जाय तो जलपान या दूध का आहार कर ले। और कुछ न खाय और गा बजा कर रात्रि में जागरण करे। और प्रति प्रहर के बाद विष्णु भगवान और शिवजी का पूजन करे । पहले प्रहर में नारियल का उत्तम अर्घ्य दे। दूसरे में श्रीफलों का और तीसरे में बिजौरों का और चौथे प्रहर में सुपारी और विशेष करके नारंगियों से पूजन करे।

पहले प्रहर के पूजन से अग्निष्टोम यज्ञका फल, दूसरेसे वाजपेय यज्ञ का और तीसरे से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। और चौथे से जागने वाले को राजसूय यज्ञ का फल मिलता है।

इससे बढकर कोई पुण्य और कोई यज्ञ नहीं है। इससे बढकर कोई विद्या और तप नहीं है। पृथ्वी में जो तीर्थ क्षेत्र और स्थान हैं, उन सबको देख लिया और उनमें नहा लिया कि जिसने भगवान का यह पद्मिनी एकादशी व्रत किया । इस प्रकार जागरण करना चाहिये, कि जब तक सूर्योदय होय। जब सूर्यका उदय हो जाय तब शुभ तीर्थपर जाकर स्नान करे। स्नान से घर आकर ईश्वर – भगवान का पूजन करे।

पहले कही हुई विधि से विद्वान्‌ ब्राह्मणोंको भोजन करावे । और कुंभ आदि जो सब वस्तु है, और भगवान की जो प्रतिमा है; उसकी विधि से पूजा करके ब्राह्मण को समर्पण कर दे । जो मनुष्य पृथ्वीपर इस प्रकार व्रत करता है, उसका जन्म सफल है, ओर वह व्रत उसे मुक्ति का फल देता है।

हे युधिष्ठिर ! जो तुमने मुझसे पूछा था सो सब मैंने तुमसे कह दिया। हे राजनन्दन ! जो मनुष्य प्रीती से पद्मिनी एकादशी के उत्तम व्रत को करता है उसने मानो सब व्रत कर लिये। अब मैं तुमसे एक बड़ी सुन्दर कथा कहूंगा, कि जो पुलस्त्य जी ने नारदजी से विस्तारपूर्वक कही थी।

कार्तवीर्य ने जब रावणको जेलखाने में डाल दिया था तब पुलत्स्य मुनि ने राजा की याचना करके उसे छुड़वाया था।

उस समय सुन्दर दर्शनीय नारदजी ने आश्चर्य से भक्तिपूर्वक श्रेष्ठमुनि पुलस्त्यजी से पूछा।

नारदजी बोलेते है – रावण ने तो इन्द्र समेत सभी देवताओंको जीत लिया था, फिर कार्तवीर्य ने रण में चतुर रावण को कैसे जीता?

नारदजी का वचन सुनकर पुलत्स्य मुनि बोले – हे पुत्र ! मैं तुमसे कार्तवीर्य की उत्पत्ति कहता हूँ।

हे नारद ! पहले त्रेतायुग में माहिष्मती नगरी में एक बड़ा भारी हेहय नाम के राजा के वंश में कार्तवीर्य नाम का राजा हुआ था।

उस राजा की प्राण के समान एक हजार रानियाँ थीं। उनमें से किसी को राज्य के योग्य पुत्र नहीं हुआ।

राजा ने यज्ञ किये, देवता पित्तर और बडे सिद्धों की पूजा की थी। और जिस किसी ने कहा वह सब कुछ किया परंतु पुत्र नहीं हुआ।

पुत्र बिना राजा को राज्य भी भाया नहीं। जैसे भूखे मनुष्य को भोग सुखदाई नहीं होते है।

राजा ने विचार कर तप करने का निश्चय किया; क्योंकि तप से ही सदा मनोकामना की सिद्धि होती है।

यह कहकर वह धर्मात्मा साधुओं जैसे वस्त्र पहन कर , जटा धारण कर राज्य मंत्री को सौंप कर शीघ्र ही तप करने को चला गया।

राजा को गया हुवा देखकर उसकी रानियो में उत्तम पद्मिनी नाम की एक रानी (जो कि राजा हरिश्वंद्र की बेटी थी) भी अपने आभूषण उतारकर तप के लिये उद्यम करने वाले अपने पति के साथ केवल एक धोती पहिन कर गंधमादन पर्वत पर गई । और वहां जाकर राजा ने दस हजार वर्ष तक तप किया ।

और वहां विष्णु भगवान का ध्यान किया, परंतु पुत्र प्राप्त नहीं हुआ।

तब उस पतिव्रता रानी ने पति का शरीर केवल हाड़ और नसों से युक्त देख विनयपूर्वक अनसूयाजी से पूछा कि हे पतिव्रताजी मेरे पति को तप करते करते आज दस हजार वर्ष बीत गये तो भी कष्ट के नाश करने वाले भगवान्‌ प्रसन्न नहीं हुये।

सो हे महासाध्वि ! कोई यथार्थ व्रत मुझसे कहो, कि जिससे भगवान्‌ मेरे ऊपर सदाके लिये प्रसन्न हो जाय।

और जिससे मेरे बड़ा भारी चक्रवर्ती पुत्र होय। उसका वचन सुनकर पतित्रता अनसूया प्रसन्न होकर कमल जेसे नेत्रवाली पद्मिनी से बोली – हे रानी ! बारह मास से अधिक मलमास होता है और हे सुंदरमुखी ! बत्तीस महीनों के बाद वह मास आता है।

उसमें द्वादशी युक्त जो दो एकादशी पद्मिेनी और परमा नाम की होती है, विधिपूर्वक उनका उपवास और जागरण करना चाहिये। उससे पुत्र देने वाले भगवान्‌ शीघ्र प्रसन्न होंगे।

राजन! यह कहकर कर्दम ऋषि की पुत्री अनसूया ने प्रसन्न होकर पहले मेरी कही हुई व्रत की सब विधि समझा दी। और जैसे मैंने व्रत की सब विधि कही थी उसे अनुसूया से सुनकर पुत्र प्राप्ति की इच्छासे रानी पद्मिनी ने सब किया।

एकादशी को सदा निराहार व्रत और रातको गीत नृत्य समेत जागरण करती थी। जब पूरा व्रत हो गया तब गरुड़ पर विराजित भगवान ने शीघ्र प्रसन्न होकर स्वयं आकर कहा, कि हे सुन्दरि ! वर मांग।

वह भगवान का वचन सनकर, प्रसन्नमुख होकर मंद मंद हंसी और प्रीति से स्तुति की और कहा – हे प्रभु ! मेरे पतिको आज एक उत्तम वर दीजिये। पद्मिनी के उस वचन को सुनकर भगवान्‌ बोले कि जैसा मुझे मलमास प्यारा है ऐसा दूसरा नहीं है। उसमें मेरी प्रीति को करनेवाली सुन्दर एकादशी होती है।

हे सुन्दरी ! उसका व्रत तुमने विधिपूर्वक किया है। सो हे सुन्दरमुखि ! उससे तुमने मुझे बड़ा प्रसन्न किया है और तुम्हारे पति को जो वह मन से चाहता है उस वर को मैं दूंगा।

संसार के दुःखनाशक भगवान राजा से बोले – हे राजेंद्र जो तुम मन में चाहते हो सो वर मांगो। तुम्हारी सिद्धि करने की इच्छा से में तुम्हारी रानी से बडा संतुष्ट हूं ।

विष्णु भगवान के ये वचन सुनकर श्रेष्ठ राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। और ऐसा वर मांगा कि हे जगन्नाथ! हे मधुसूदन ! सब लोग जिसको प्रणाम करे ऐसा पराक्रमी जिसे देवता. मनुष्य, नाग, दैत्य, दानव ओर राक्षस इनमेंसे कोई भी आपके सिवाय जिसको कोई नहीं जीत सके ऐसा पुत्र मुझे दे दो।

जब उसने भगवान से ऐसा कहा तो “अच्छा, ऐसा ही होय” यह कहकर वे अंतर्धान हो गये। राजा भी यह सुनकर बड़ा प्रसन्न हष्ट पुष्ट हो सब काम कर नर नारियोंसे सुन्दर भरे हुए अपने रमणीक पुर में आया। और उसकी रानी पद्मिनी को महाबली कार्तवीर्य नामक पुत्र हुआ। जिसके समान तीनों लोकों में कोई पुरुष नहीं है।

इसलिये दशकंधर रावण युद्ध में उससे हार गया। और चक्र गदा धारण किये श्री विष्णु भगवान के बिना तीनों लोक में कोई उसे जीतने को समर्थ नहीं है।

सो तुम्हें रावण की हार में आश्चर्य नहीं करना चाहिये। मलमास के प्रसाद से और पद्मिनी के उपवास से देवों के देव भगवान ने महाबली कार्तवीये को दिया है।

यह कहकर पुलत्स्य जी प्रसन्न मन से चले गये। श्रीकृष्ण जी बोले – हे निष्पाप युधिष्ठिर ! यह जो तुमने पूछा था, सो सब कह दिया। जो कोई मलमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करेंगे वे मनुष्य विष्णु पद को पावेंगे। हे राजेन्द्र ! जो तुम कुछ मनोकामना चाहते हो, तो तुम भी इस व्रत को करो।

भगवान का वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुये और उन्होंने अपने बंधु और परिवार समेत विधिपूर्वक यह व्रत किया।

सूतजी बोलते है – हे द्विज ! पहले जो तुमने मुझसे पूछा था, सो सब मेंने तुमसे कहा । ऐसा यह व्रत बड़ा पुण्य ओर पवित्र है। अब फिर क्या सुनना चाहते हो ? जो मनुष्य इस प्रकार मलमास के व्रत को भक्ति से करेंगे और जो बड़े सुखके देनेवाली शुक्ल पक्ष की एकादशी का उपवास करेंगे वे पुरुष इस पृथ्वी में धन्य हैं। और जो मनुष्य इसकी संपूर्ण विधि को सुनेंगे वे भी फल के भागी होंगे और जो इस संपूर्ण कथा को सुनेंगे वे निश्चय ही विष्णुधाम को जायेंगे।

॥ इति अधिक शुक्लैकादशी कथा समाप्ता ॥

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