पंथवारी माता की कहानी : बुढ़िया की तीर्थ यात्रा

पंथवारी माता की कहानी “बुढ़िया की तीर्थ यात्रा” : प्यारी बाई के कहानी संग्रह से ली गयी दशामाता पर्व की कहानी

एक गांव था । वहां के कुछ लोग यात्रा पर जा रहे थे। गाँव में एक बुढ़िया भी रहती थी।

उस बुढ़िया ने सोचा कि मैं भी यात्रा पर जाऊं तो उसने लोगों को बोला । एक आदमी ने बोला तुम अपने पैरों से चलोगी हम अपने पैरों से चलेंगे आ जाओ तुम भी साथ में हमारे। पहले पैदल यात्रा होती थी। थोड़ी दूर चलने क बाद बुढ़िया थक गयी। अब और उससे चला नही जा रहा था । वही पास में एक सुन्दर मंदिर भी बना हुआ था। वहा पंथवारी माता भी थी।

पंथवारी माता का स्थान देख कर बुढ़िया बोली कि मुझसे अब चला नी जा रहा है, तुम लोग जाओ, में तुम्हारे नाम की भी पंथवारी पूजूंगी ।

तुम लोग मेरे नाम की भी सब भगवान के धोक लगाना ।  

पंथवारी माता

बुढ़िया रोज पंथवारी पूजती थी और कहती थी हे पंथवारी माता मुझे पीली लीपा आंगन मिले, खेरा पे खिचड़ी सीजरि हो, खूटि पे वेस रखा मिले,  कोरी मटकी भरी हो, उसके उपर झरझर्ता हुआ घरना हो, उसके उपर उलटी इमरती (लोठा) पड़ी हो।  कुछ दिनों बाद वो लोग यात्रा करके वापिस आ गये। वापस आकर लोगों ने उस बुढ़िया को बोला कि चलो बाई यात्रा पूरी हो गई, घर चलते हैं।

बुढ़िया जब घर पहुंची तो उसको अपने घर पीली लीपा हुआ आंगन मिला, खूंटी पर वेस लटका हुआ मिला, खेरो पर खिचड़ी बनती हुई मिली, कोरी मटकी पानी से भरी हुई मिली और उस पर इमरती उलटी रखी हुई मिली।

यह सब देखकर बुढ़िया खुश हो गई।

बुढ़िया ने खिचड़ी खाई और पानी पिया और वह सो गई रात को सोते सोते वह सोचने लगी कि सब लोग तो यात्रा से कंठी और प्रसाद लेकर आए हैं । वो सब तो कंठी और प्रसाद बाटेंगे, में क्या दूंगी सब लोगों को।

मेरे पास तो कंठी प्रसाद थाली कुछ भी नहीं है । मैं क्या बाटूंगी। पथवारी माता की कृपा से उसके घर प्रसाद और मेवे की बोरियां आ गई, कंठीया आ गई और बहुत सारी थालियां आ गई।

बुढ़िया सुबह उठी और नहा धोकर नया वेस पहनकर अच्छे से वह तैयार हो गई और यह सब प्रसाद थालियों, और इतनी सारी कंठियाँ देखकर वह बहुत खुश हो गई।

बाकी लोग तो थोड़ा थोड़ा प्रसाद दे रहे थे लेकिन बुढ़िया तो थाली भर भर कर थाली सहित  मेवे वाला प्रसाद दे रही थी।

जो लोग यात्रा करने गए थे उनको भी बहुत आश्चर्य हो गया उन्होंने बुढ़िया से बोला कि तुम तो यात्रा पर भी नहीं गई थी और तुम्हारे पास प्रसाद  भी नहीं था, तो तुम्हारे पास इतनी सारी थालीया और इतना सारा प्रसाद कहां से आ गया। इस पर बुढ़िया बोली कि यह सब पंथवारी माता की कृपा से हुआ।

उसके बाद से जो भी लोग यात्रा करने जाते हैं तो जाने से पहले और आने के बाद पंथवारी पूजते हैं।और पंथवारी पूजने के बाद लोगों को गाजे-बाजे के साथ घर पर लाते हैं।

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